फसलों में आवश्‍यक पोषक तत्‍वों की कमी

के लक्षण तथा सुधार के उपाय


    पौधों को हरा-भरा रखने, पर्याप्‍त वृद्धि फसल एवं फसल उत्‍पादन में जल कार्बन तथा अनेकों खनिज तत्‍वों की आवश्‍यकता होती है। पौधे में सबसे अधिक (लगभग 80 - 90प्रतिशत) मात्रा जल की होती है। जल के बाद कार्बन पौधे के प्रत्‍येक भाग के निर्माण में काम आता है। पौधे को कार्बन वायु के कार्बनडाई आक्‍साइड से प्राप्‍त होता है। वायु मण्‍डल में लगभग 0.03प्रतिशत आयतन में कार्बन डाई काक्‍साइड रहता है। 

 
 पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए निम्‍न 16 आवश्‍यक तत्‍वों की आवश्‍यकता होती है।

प्रमुख पोषक तत्‍व :-

1. कार्बन जल तथावायु मण्‍डलीय कार्बन डाईआक्‍साइड से प्राप्‍त होते हैं। यह मिनरल पोषक तत्‍व नहीं हैं।
2. हाईड्रोजन
3. आक्‍सीजन
(अ)     प्रधान तत्‍व :-
4. नत्रजन मिट्टी में उर्वरकों के माध्‍यम से दिये जाते है।
5. फास्‍फोरस
6. पोटाश
(ब)     गौण तत्‍व :-   
7. सल्‍फर मृदा की भौतिक दशा में सुधार करते हैं, कभी- कभी उर्वरक के रूप में भी दिये जाते है।
8. कैल्शियम
9. मेग्‍नीशियम
(स)     सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व :-
10. जिंक पौधों को बहुत ही कम मात्रा में आवश्‍यकता होती है। इसीलिए सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व कहलाते हैं।
11. आयरन
12. मैंग्‍नीजइ
13. कापर
14. बोरान
15. मालिब्‍डेनम
16. क्‍लौरीन

     उपरोक्‍त समस्‍त 16 पोषक तत्‍वों में किसी एक तत्‍व की कमी  होने पर पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है, जिसे उपर्युक्‍त मात्रा में प्रयोग करके ही दूर किया जा सकता है।

     
विभिन्‍न पोषक तत्‍वों की कमी के लक्षण पौधें की पत्तियों पर निम्‍न प्रकार दिखायी पड़ते हैं।

क्रम सं0 पत्तियों की स्थिति पोषक तत्‍वों के नाम 
1. पुरानी पत्तियों पर
(Old Leaves)
नत्रजन, फास्‍फोरस, पौटाश, मैग्‍नीशियम, जिंक, मोलिडेनम।
2 नई पत्तियों पर
(New Leaves)
आयरन, मैग्‍नीज, कापर, सल्‍फर
3. अविकसित पत्तियों पर
(Bad Leaves)
कैल्शियम, बोरान

    पोषक तत्‍वों की कमी से उत्‍पन्‍न होने वाले लक्षण निम्‍नवत् हैं :-

1- नत्रजन :-

1- पौधे कमजोर होकर पत्तियां पीली पड़ने लगती है।
2- तीव नत्रजन की कमी होने पर पत्तियां झुलस कर ब्राउन रंग की हो जाती है।
3- पत्तियों का जल्‍दी झड़ना तथा चारे औरुसलों में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती हैं।
4- पौधों की पर्याप्‍त वृद्धि न होना तथा समय से पहले पक जाना।

    उपरोक्‍त स्थितियों में मृदा के अन्‍तर्गत पर्याप्‍त मात्रा में नत्रजन उर्वरकों तथा जैविक खादों के माध्‍यम को प्रयोग करने की सलाह दी जाती है।

2- फास्‍फोरस :-

1- पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है, देर से पकते हैं तथा उनकी गुणवत्‍ता अच्‍छी नहीं होती है।
2- खाद्यान्‍न फसलों में टिलरिंग कम हो जाती है पत्तियों की नोको पर बैगनी चकत्‍ते बन जाते हैं।
3- पत्‍ते सीधे खड़े हो जाते है और संकरे दिखाई देते हैं।
4- जड़ों का पर्याप्‍त विकास नहीं होता हैं।
5- मिट्टी में अम्‍लता बढ़ती है, क्‍योंकि इसकी कमी होने से चूने की कमी होती है और फास्‍फोरस कैल्शियम फास्‍फेट के रूप में अधिक पाया जाता है।

 
फास्‍फोरस की कमी को पूरा करने के लिए फास्‍फोरसयुक्‍त उर्वरक को जीवांश पदार्थ में मिलाकर कुछ दिन के लिए छोड़ दिया जाय, तत्‍पश्‍चात् मिट्टी में डालने से अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त होते हैं।  

3- पोटाश :-

    मिट्टी के निर्माण में सम्मिलित होने वाले खनिजों में फेल्‍सयार तथा माइका से मिट्टी को पोटाश मिलती हैं।

1- आनाज की फसलों में नोकों तथा किनारों का पीला पड़ना, यह लक्षण प्रारम्‍भ में पुरानी पत्तियों पर देखे जाते हैं।
2- पत्‍ते हरित द्रव्‍य का अभाव रहता है। पत्‍ते की नोक आस पास का किनारे का भाग, इन पर छोटी झुलसी हुई बूंदे दिखाये देने लगती है।
3- पत्‍ते के नोक मुड़ जाते हैं, दाने का आकार छोटा तथा रोग रोधी क्षमता कम हो जाती है।

    पौटाश की कमी के लक्षण प्राय: पौधे में देरे से स्‍पष्‍ट होती है, इसलिए मिट्टी में इसकी कमी की जानकारी होने पर प्रारम्‍भ में ही इस तत्‍व की पूर्ति कर देनी चाहिए।

4- गौण तत्‍व :-

   ।) कैल्शियम :-

1- कैल्शियम की कमी से नई कोपलों में हरिद्रव्‍य का अभाव रहता है। पौधे के आखिरी हिस्‍से का आकार-प्रकार खराब एवं अस्‍वस्‍थ हो जाता है।

2- कोपले झुक जाती है तथा नोक सूखने लगती है।
3- पौधे की कोशिकाओं में उपस्थित टाक्सिक पदार्थ विपरीत प्रभाव डालते हैं।
4- चूने की कमी से मृदा विन्‍यास पर बुरा असर पड़ता है तथा आनाज और बीज का विकास नहीं होता है।

    मृदा में कैलशियम की मात्रा की प्राय: मृदा सुधार को डोलोमाइट (लगभग 20प्रतिशत कैल्शियम), जिप्‍सम (21प्रतिशत कैल्शियम), चूना आदि का प्रयोग दूर करके की जाती है।

   2) मैगनीशियम :-

1- पत्‍तो की नोक और किनारे के भाग की तरु से हरिद द्रव्‍यों का नाश होता है।
2- पत्‍तों पर झुलसे हुए बिन्‍दु एवं नसें हरी नहीं रहती हैं।
3- पत्‍ते की नोंक, किनारे का भाग अथवा डंठल के पास झुके हुए रहते हैं।  
4- पत्‍ते आसानी से झड़ जाते है।

    मिट्टी में इसकी कमी मेगनीशियम सल्‍फेट  डालोमेइट गेगनीसइट   आदि का प्रयोग करने से दूर की जा सकती है। मिट्टी में इसकी कमी मेगनीशियम सल्‍फेट (19.6%MG), डालोमेइट (5.20Mgo) , मेगनीसाइट (40%Mgo) आदि का प्रयोग करके से दूर की जा सकती है।

    3) सल्‍फर :-

    1- बीजोत्‍पादन तथा पौधों की जड़ों की वृद्धि प्रभावति होती है।

    2-    पत्‍ती की नसें अधिक फीकी दिखायी देने लगती है।

     मिट्टी में सल्‍फर की कमी सल्‍फर युक्‍त उर्वरक जैसे सि0 फास्‍फेट (12 %सल्‍फर), अमोनिया सल्‍फेट (24% सल्‍फर) पोटेशियम सल्‍फेट (8% सल्‍फर) अथवा जिप्‍सम आदि के प्रयोग से कमी को दूर किया जा सकता है।

फसलों में आवश्‍यक सूक्ष्‍म तत्‍वों की कमी के चिन्‍ह तथा उपाय   

सूक्ष्‍म तत्‍व

कमी के चिन्‍ह

उपाय

1- आयरन (लोहा)

नई पत्तियां सर्वप्रथम प्रभावित होती है पत्तियों का रंग पीला हो जाता है। पत्‍तों पर बिन्‍दु नहीं दिखाई देते हैं, परन्‍तु पत्‍तों की नसें हरी बनी रहती हैं। फसलों के अन्‍दर कमी के लक्षण 2-5 सप्‍ताह में दिखाई पड़नें लगते हैं।

लोहे के काम्‍पलेक्‍स साल्‍ट का पणीय छिड़काव करते है लोहे के चिलेटरा का प्रयोग भी मिटटी में मिलाकर किया जाता है। 20-40 कि0ग्रा0 फेरस सल्‍फेट प्रति हेक्‍टेयर डालना चाहिए। ( 0.4 प्रतिशत फेरस सल्‍फेट 0.2 प्रतिशत चूना) 150 लीटर प्रति हे0 की दर से पणीय छिड़काव करना चाहिए।

2- मैनगीनज

पत्‍तो में हरित द्रव्‍यों का अभाव रहता है। प्रमुख ओर छोटी नसें गहरें हरे रंग की दिखाई देती है। इस कारण पत्‍ते पर चोरस नक्‍कासी दिखाई देती है। सर्वप्रथम मध्‍य भाग की पत्तियां प्रभावित होती है। गेंहू में 6 से 7 सप्‍ताह बाद कमी के लक्षण दिखाई पड्ते हैं।

40-50 किलो मैनगीनज सल्‍फेट प्रति हे0 प्रयोग करने से लाभ होता है। पणीय छिड़काव हेतु (0.5प्रतिशत मैनगीनज सल्‍फेट 0.3 प्रतिशत चूना) का पणीय छिड़काव करना चाहिए।

3- जिंक

पत्‍ते छोटे ओर संकरे होते है। पत्‍तों में हरित द्रव्‍यों का अभाव दिखाई देने लगता है। नसे हरी बनी रहती हैं। झुलसे हुए बिन्‍दु, पत्‍तों की नसें, किनारे का भाग, नोक तथा पूरे पत्‍ते पर बिखरे रहते है। धान की फसल में प्रारम्‍भ में तत्‍व की आवश्‍यकता अधिक होती है, बाद में घट जाती है।

जिंक सल्‍फेट पाउडर का प्रयोग 40-50 किलो प्रति हेक्‍टेयर की दर से करते हैं अथवा 0.5 से 1.5 प्रतिशत जिंक सल्‍फेट अथवा चिलेटस का छिड़काव करने से लाभ होता है।

4- कापर

पत्तियों की नसों के बीच के भाग में पीलापन आ जाता है। पत्‍ते मुरझा जाते हैं तथा थोड़ा सा भी धक्‍का लगने पर गड़ने लगते हैं। कापर की कमी मिटटी के लगातार शुष्‍क रहने पर देखी गई है।

आवश्‍यकतानुसार 1-5 कि0 प्रति हेक्‍टेयर कापर सल्‍फेट पाउडर का प्रयोग अथवा 0.5 प्रतिशत से 1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करने से लाभ होता है।

5 - बोरान

वनस्‍पति के नोक पर नई कोपलों का रंग डंठल की आरे से फिका होने लगता है। नई कोपलें डंठल की ओर से मुरझाने लगती है तथा नये विकसित पत्‍ते भी मुरझाने लगते हैंा टिसूज प्रभावित होने से पौधे का आकार टेड़ा तथा खराब दिखाई पड़ता है।

औसत दर्जे की मिटटी में 5-10 किलोग्राम बोराक्‍स डालते है। बोरान की अधिक मात्रा के साथ 150 लीटर प्रति हेक्‍टेयर की दर से फसलों पर छिड़कना चाहिए।

6-मालिब्‍डेनम

पत्‍ते हल्‍के हरे रंग के हो जाते हैं सुनहरे पीले अथवा केसरी बूंदे पत्‍तों पर दिखाई देने लगती हैं। यह बूंदे नसों पर नहीं होती है। पत्‍ते के निचले भाग से रेगिनयुक्‍त चिकना पदार्थ आता है। गेहूं की फसल में 6सप्‍ताह की आयु पर पत्‍ती की लम्‍बाई पर सुनहरी धारियां जो बाद में भूरे रंग की हो जाती है।

प्राय: फास्‍फेटिक उर्वरक के साथ प्रयोग करते है। मालिव्‍डेनम की बहुत ही कम मात्रा अर्थात 400 से 500 ग्राम सोडियम मालिव्‍डेनम प्रति हे0 का प्रयोग करते हैं। 0.03 प्रतिशत सोडियम मालिव्‍डेनम का घोल 150 ली0 प्रति हेक्‍टेयर की दर से फसलों पर छिड़कना चाहिए।

7- क्‍लोरिन

प्राय: मृदा में इसकी कमी देखने को नहीं मिलती है परन्‍तु बलुई मृदा में इसकी कमी हो सकती है। अधिक कमी की अवस्‍था में पोघों पर फल नहीं बनता है ऊतक क्षय हो जाता है।

पौधों को 4000 किलो शुष्‍क पदार्थ पैदा करने के लिए एक किलो क्‍लोरीन की आवश्‍यकता होती है। क्‍लोरिन की आपूर्ति सिंचाई, वर्षा जल अथवा क्‍लोरिन युक्‍त उर्वरक के प्रयोग करके दूर की जा सकती है।